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ताड़ोबा : अमीरों की ऐश, 219 गरीबों की मौत


नाच-गाने के फेस्टिवल-2024 में क्या मृतकों के परिवारों को आमंत्रित किया जाएगा ?

VIP कल्चर पर फूंके जाने वाले करोड़ों रुपये पर चुप्पी क्यों ?

@चंद्रपुर
बरसों से ताड़ोबा के जल-जंगल-जमीन को स्थानीय ग्रामीणों ने सींचा व सुरक्षा रखा। आज भले ही यह स्थल बाघ पर्यटन की दृष्टि से विश्व प्रसिद्ध हो गया, लेकिन यहां आने वाले अमीर पर्यटकों की यह ऐश स्थली अब गरीबों की कब्रगाह के रूप में कुख्यात बन गई है। एक रिपोर्ट की मानें तो बीते 13 सालों में 219 ग्रामीणों के ताड़ोबा के बाघों के कारण अपनी जान गंवा दी। भले ही सरकार वन्यजीव-मानव संघर्ष पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहायी हो, लेकिन मौत का सिलसिला रोकने में सरकार, मंत्री, नेता, प्रशासन हर कोई नाकाम रहा है।

अब आलम यह है कि अमीरों के VIP कल्चर की शानोशौकत को बढ़ावा देने ताड़ोबा फेस्टिवल 2024 के नाम पर फिल्मी जगत के कलाकारों का नाच-गाने का आयोजन 1 मार्च 2024 से होने जा रहा है। सरकार और वन प्रशासन, स्थानीय पालकमंत्री सुधीर मुनगंटीवार की अगुवायी में 3 दिन के महोत्सव में करोड़ों की धन राशि फूंक देंगे। लेकिन सवाल यह है कि सिर्फ चुनावों के मुहाने पर ही ऐसे आयोजन क्यों ? कितने करोड़ खर्च किये जाएंगे ? वहीं बाघों के हमलों में जिन परिवारों ने अपना मुखिया, पति, पत्नी, माता, पिता को खो चुके हैं, क्या उन दु:खी परिवारों को इस महोत्सव में कोई जगह मिलेगी ? क्या उन्हें इस महोत्सव में शरीक़ करने के लिए आमंत्रित किया जाएगा ? क्या उनके लिए दर्शक दिर्घा की कुर्सियां आरक्षित रहेगी ? क्या उनके परिजनों के शहादत का सम्मान किया जाएगा ? 

हर साल कमाई 11.03 करोड़ लेकिन चंद्रपुरवासियों के लिए कोई छूट नहीं
राज्य सरकार की ओर से ताड़ोबा के विकास के नाम पर करोड़ों की निधि प्रत्येक वर्ष खर्च की जाती है। इन्हें ताड़ोबा सफारी के नाम पर 11 करोड़ से अधिक का राजस्व प्राप्त होता है। मानव-वन्यजीव संघर्ष को टालने के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही है। गत वर्ष बाघों के हमलों में मारे गये 9 पीड़ित परिवारों में महज 1 करोड़ 40 लाख रुपये बांटे गये। लेकिन इन योजनाओं के क्रियान्वयन की सच्चाई और अपेक्षित सफलता संदेह के घेरे में है। चंद्रपुरवासियों ने जंगलों की रक्षा की। लेकिन देश-विदेश के अमीर पर्यटक यहां 4075 रुपये की टिकट लेकर सफारी का मजा उठाते है। ताड़ोबा से सटे गरीब किसानों से खरीदी गई भूमि पर बने रिसोर्ट में रुककर ऐश करते हैं। चंद्रपुरवासियों को सफारी की टिकट में किसी तरह की कोई छूट या रियायत नहीं मिलती। यह पर्यटन गरीब व मध्यमवर्गीयों की पहुंच से दूर है। जबकि बाघों के हमलों के दंश के अलावा फसलों की बर्बादी स्थानीय लोग झेल रहे हैं।

वन मंत्री की चेतावनी निकली खोखली

एबीपी न्यूज की वेबसाइट ने दावा किया है कि महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार अपने विभाग के अधिकारियों से उचित कदम उठाकर चंद्रपुर में बाघ-मानव संघर्ष को रोकने के लिए कह चुके हैं। एक प्रेस रिलीज में मंत्री के हवाले से कहा गया था कि यदि अधिकारी बाघ-मानव संघर्ष को रोकने में विफल रहते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। लेकिन हैरत की बात है कि मंत्री मुनगंटीवार की चेतावनी के बाद अब तक किसी भी अफसर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई और न ही मौत का सिलसिला थम पाया।

हर साल मर रहे ग्रामीण किसान
नवभारत की वेबसाइट ने दावा किया है कि हर साल ताड़ोबा व उससे सटे जंगल परिसर में बाघ व अन्य वन्यजीवों के हमलों से ग्रामीणों की मौत हो रही है। यह सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। बीते 13 वर्षों में 219 लोगों ने अपनी जान गंवाई। मृतकों में 146 पुरुषों के अलावा 73 महिलाओं को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। वहीं तेंदुए के हमलों में 11 बच्चे बलि चढ़ गये।

ताड़ोबा का इतिहास
पौराणिक कथा के अनुसार तारू नाम के एक गोंड आदिवासी योद्धा ने शक्तिशाली बाघ से युद्ध किया था, इसलिए उन्हीं के नाम पर तारू झील व मंदिर बनाया गया। पश्चात इसे ही तारू शब्द के अपभ्रंश में ताड़ोबा कहा जाने लगा। इस जंगल क्षेत्र को वर्ष 1879 में आरक्षित वन घोषित किया गया। वर्ष 1905 से यहां बाघों के शिकार पर प्रतिबंध लगाया गया। वर्ष 1955 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। 1993 में राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य का विलय कर इस 622.87 वर्ग किमी में फैले क्षेत्र को ताड़ोबा अंधारी टाइगर रिजर्व की स्थापना की गई।

ऐसे बढ़ती गई बाघों की संख्या
एबीपी न्यूज की वेबसाइट में जारी खबर में उन्होंने दावा किया है कि वर्ष 2010 में 15 बाघ, वर्ष 2012 में 47 बाघ, 2013 में 50 बाघ, 2014 में 65, 2015 में 71, 2016 में 69, 2017 में 75, 2018 में 81, 2019 में 88, 2020 में 85, 2021 में 85, 2022 में 87 एवं वर्ष 2023 में 93 बाघ देखे गये। उल्लेखनीय है कि thequit.com की एक न्यूज में विष्णु गजानन पांडे दावा करते हैं कि महाराष्ट्र में वर्ष 2019 से 2022 के दौरान 4 वर्षों में 298 लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। वहीं 2019 में एकमात्र चंद्रपुर जिले में 39 लोग मारे गये।